The poem titled “Identity” was originally written in Hindi. Although I had tried my best to do full justice to the English translation, still I believe that it is almost impossible to convey the same meaning in a translation. I am therefore posting the original version here for the benefit of those who can read Hindi.
तुम्हारा विराट अस्तित्व!
वलयों के दायरों में होते हुए भी,
बिन्दु रेखाओं की सीमाओं से परे!
और मैं?
आकाश-गंगा की दुग्ध-धारा में हिचकोले खाता,
एक अदना सा ऊल्का-पिंड!
तुम, स्थितप्रज्ञ!
वातायनों से आते झोंकों से बुनते,
अपनी ऊर्जस्वितता के ताने-बाने!
जलधि की चंचल लहरों पर तिराते,
अपने ऐतिहासिक अंतर्द्वन्द्व की किश्तियाँ!
जो बहती चली जातीं हैं,
काल क्षितिज की सीमाओं के परे!
रह जाता है-
बस तुम्हारा,
बस तुम्हारे विराट अस्तित्व का, आतंक,
चक्षुओं के राज्य में!
इधर,
मेरी जिजीविषा,
सुरधनु के एक सिरे से,
बहती हुई,
प्रत्यंचा के पथ से,
पहुँच जाती है,
संघर्ष के शर-बिन्दु तक,
मधु-संधान में!
उधर,
मेरे गर्व-रथ के तुरंग,
खींचते ले जाते हैं, कलेवर,
मेरे अस्तित्व-बोध का!
उनकी हर पदचाप के साथ,
बृहत्तर होता जाता है,
तुम्हारा काल-चिंतन!
इधर,
दिग्दाहों से उठते धूम के साथ,
मेरे प्रज्वलित कलेवर से निकलती,
अस्थि-ध्वनि,
गूंजती जाती है,
समष्टि के कर्ण-पट पर!
उधर,
तुम्हारी किं-कर्तव्य-विमूढ़ता के मलयज में,
तिरते हुए बिखर जाते हैं,
चुपचाप,
क्षार-बिन्दु,
मेरे अस्तित्व-बोध के!
